उत्तराखंड की बेटी बबीता का संघर्ष बना लोगों के लिए मिसाल आर्थिक तंगी के बावजूद भी खड़ा किया अपना बिजनेस……………….

आज हम आपको उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग की रहने वाली बबीता रावत की कहानी सुनाने वाले हैं जिन्होंने अपने बचपन से लेकर काफी संघर्षों को सामने किया लेकिन कभी हार नहीं मानी और आज अपने दम पर एक बड़ी कंपनी खड़ी कर दी है परिवार को आर्थिक संकट से उबारने के लिए उन्होंने अपने खाली पड़ी सतरा नालियों जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए जुताई शुरू कर दी और जरा सा भी पीछे नहीं हटी साथ ही साथ उन्होंने सब्जी उगाना और पशुपालन और मुस्लिम उत्पादन की सफलता की कहानी भी लिखी उन्होंने हर क्षेत्र में आगे बढ़ गई उनके लिए उन्हें राज्य सरकार द्वारा सम्मानित किया गया।

रुद्रप्रयाग जिले के गांव सऊद उमरेला की रहने वाली 23 वर्षीय बबीता का संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था। बबीता जब 13 साल की थीं, तब उनके पिता सुरेंद्र सिंह रावत ने उनकी सेहत के लिए बिस्तर पकड़ लिया था। ऐसे में छह भाई-बहनों की जिम्मेदारी उस सिंगल लाइफ पर आ गई, क्योंकि वह परिवार में सबसे बड़ी थी। लेकिन इस बीच उसने हिम्मत नहीं हारी और गायों को पालने के साथ-साथ वह खुद भी खेतों की जुताई करने लगी। वह सुबह खेतों में काम करने के बाद 5 किमी पैदल चलकर इंटर कॉलेज रुद्रप्रयाग में पढ़ाई के लिए जाती थी। दूध बेचकर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण किया।
बबीता ने दिन-रात मेहनत कर न सिर्फ परिवार की जिम्मेदारी पूरी की बल्कि पिता की दवा भी संभाली और इसके साथ ही उन्होंने मास्टर्स तक की पढ़ाई भी पूरी की। इसके अलावा उन्होंने अपनी दो बड़ी बहनों की भी शादी करा दी। धीरे-धीरे संघर्ष रंग लाया, और बबीता ने भी सब्जियां उगाना शुरू कर दिया और पिछले दो वर्षों से वह सीमित संसाधनों के साथ मशरूम का उत्पादन कर रही है। इससे उन्हें हर महीने आठ से दस हजार रुपये की आमदनी हो जाती है।
बबीता ने लॉकडाउन के दौरान भी मटर, भिंडी, शिमला मिर्च, बैगन, पत्ता गोभी आदि सब्जियां पैदा कर लाचारी महसूस करने वालों को जमीन पर आत्मनिर्भरता का मॉडल दिखाया. अब वह गांव-गांव जाकर महिलाओं को स्वरोजगार के प्रति जागरूक करने का काम कर रही हैं। उनसे प्रेरणा लेकर अन्य महिलाएं भी व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ रही हैं। उन्होंने बताया कि सऊदी अम्ब्रेला में न सिर्फ एसडीएम-डीएम बल्कि मंत्री भी उनका काम देखने आए हैं. लेकिन, किसी ने उनकी समस्या का समाधान नहीं किया। उन्हें आज तक किसी भी सरकारी एजेंसी से कोई सहयोग नहीं मिला है।

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