उत्तराखंड के मुन्सयारी में 3500 से 4200मीटर ऊंचाई पर मिलने वाला ब्रह्मकमल अब निचले स्थानों पर भी दिख रहा है

यह तो साफ है दिख रहा है कि लॉक डाउन की वजह से हमारा वातावरण काफी स्वच्छ हो रहा है। आजकल तो मौसम भी अपने जलवे दिखा रहा है बादलों की मस्ती देख कर तो कोई भी मनुष्य मंत्रमुग्ध हो जाता है। लॉकडाउन के बाद कई ऐसे पौधे, जीव-जंतु कई सालों बाद देखने को मिल रहे हैं जिन्हें हम नहीं देख पाते थे या नहीं देखने को मिलते थे। जिन्हें हम लुप्त प्राय जातियां बोलते थे। वहीं उत्तराखंड के मुनस्यारी में 3500 से 4200 मीटर ऊंचाई पर मिलने वाला ब्रह्म कमल फूल 3000 मीटर पर भी दिख रहा है।


लॉकडाउन से 5 महीने में प्रदूषण स्तर घटा है इससे पर्यावरण में बदलाव आया है निश्चित तौर पर पर्यावरण में बदलाव के कारण ब्रह्म कमल का दायरा बढ़ रहा है। (एनसी जोशी वैज्ञानिक वाइल्डलाइफ संस्था, देहरादून)

कम आवाजाही का असर


लॉकडाउन के कारण हुए मौसम में बदलाव से राज्य पुष्प ब्रह्मकमल की ना केवल पैदावार बेहतर हुई है बल्कि इसके दायरे में भी इजाफा हुआ है। आमतौर पर 3500 से 4200 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाला ही है यह पुष्प इस बार 3000 मीटर की ऊंचाई पर दिख रहा है मुनस्यारी के उच्च हिमालई क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों- ग्लेशियरों में ब्रह्म कमल खूबसूरती भी कह रहा है। कहते हैं कि यह कमल बहुत ही महत्वपूर्ण है इससे राज्य कमल की उपाधि दी गई है वह यह कमल आसानी से नहीं देखने को मिलता था परंतु लॉकडाउन में कम आवाजाही की वजह से इस कमल को अब निकली क्षेत्रों में भी देखा जा सकता है वैज्ञानिकों का मानना है कि लॉकडाउन के चलते पर्यावरण स्वच्छ होने से ब्रह्म कमल के निचले क्षेत्रों में पैदावार हुई है 4 भावों ने पहली बार निचले इलाकों में इसे खिलते देखा है।

आस्था में विशेष पहचान ब्रह्मकमल

ब्रह्मकमल सीमांत की आस्था में विशेष पहचान रखता है मुनस्यारी क्षेत्र में केवल ब्रह्मकमल से ही मां नंदा की पूजा करने की परंपरा वर्षो से चली आ रही है। यहां के लोग नंदाष्टमी से पहले ढोल नगाड़ों के साथ दुर्गम स्थानों से होकर ब्रह्मकमल लेकर उच्च हिमालई क्षेत्रों में पहुंचते हैं। और बा नंदा को वह चढ़ाते हैं यह ब्रह्मकमल आस्था का विशेष प्रतीक है विशेष स्थानीय निवासी बहुत ही महत्वपूर्ण मानते हैं।
अनुसार ब्रह्म कमल की 31 प्रजातियाँ होती हैं। प्रारम्भ में ये हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते थे, पर अब लोग इन्हें घर में लगाने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश में इसे ‘दुधाफूल’, कश्मीर में ‘गलगल’, श्रीलंका में ‘कदुफूल’ और जापान में ‘गेक्का विजन’ कहते हैं।

ब्रह्मकमल औषधीय गुणों से भी भरपूर है

उच्च हिमालई क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों में ग्लेशियरों की शोभा बढ़ाने वाला ब्रह्मकमल औषधीय गुणों से भी भरपूर है वैज्ञानिकों के अनुसार इसका सेवन कैंसर पीड़ितों के लिए लाभकारी है मुनस्यारी के स्थानीय लोगों का दावा है कि उच्च रक्तचाप और दिल के मरीजों के लिए रामबाण है।
वनस्पति शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म कमल की 31 प्रजातियाँ होती हैं। प्रारम्भ में ये हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते थे, पर अब लोग इन्हें घर में लगाने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश में इसे ‘दुधाफूल’, कश्मीर में ‘गलगल’, श्रीलंका में ‘कदुफूल’ और जापान में ‘गेक्का विजन’ कहते हैं। दन्तकथाओं के अनुसार, गणेश के सिर की जगह हाथी का सिर लगाने के लिए इस फूल के प्रयोग किया गया था।

विशेषताओ से भरपूर है यह फूल।

ब्रह्म कमल एक पौधा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसके फूल में हैं, जो वर्ष में एक ही बार खिलते हैं। ज्यादातर समय ये फूल जुलाई से सितम्बर के बीच खिलते हैं। वर्ष में एक ही बार खिलने के कारण ये बहुत दुर्लभ होते हैं।
उत्तराखंड के राज्य पुष्प ब्रह्मकमल के पौधे की ऊंचाई 1 से ढाई फीट तक होती है और यह पत्थरों वाले स्थानों पर ही मिलता है। मुनस्यारी में मिलती है 3 प्रजातियां ब्रह्मकमल कस्तूरा कमल, फैन कमल। हीरामणि ग्लेशिया जिंबा, मल्या,चौड़ी, चरथी बुग्याल, रन थन टॉप, जेम्याल,लस्पा, ग्यार में ब्रह्म कमल बहुतायत में मिलता है। पर्यावरणविद् बृजेश सिंह ने बताया कि लॉकडाउन के कारण प्रदूषण में भारी कमी आई है यही वजह है कि ब्रह्म कमल का दायरा बढ़ रहा है।

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